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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

दया शंकर शरण

22 कविताएं

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यादों की धीमी आंच में सुलगती रही होगी
शम्मा रातभर अकेली जलती रही होगी

एक सुबह धूप की बाँहों में मचलती रही होगी
कोई शाम रात के पहलू में सिमटती रही होगी

एक उफनती हुई नदी आ गयी है इधर
मुमकिन है कहीं पे बर्फ पिघलती रही होगी

उठेगी तेज आँधियों में हर सिम्त से हवा
जो धीमी रफ्तार में अबतक चलती रही होगी

उसने खुदकुशी कर ली आइनें में देखकर
उसे अपनी ही शक्ल कातिल लगती रही होगी

उठकर ख्वाबगाहों से नींद गायब थी कहीं
कोई याद रातभर करवटें बदलती रही होगी

उसके बगैर जीने का कोई मतलब भी नहीं
गोया बुझती हुई कोई लौ फफकती रही होगी

ये कैसा सफर था कि वह राह में कहीं ठहरा भी नहीं
उसकी तिश्नगी हीं ऐसी थी कि ठिकाने बदलती रही होगी

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