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मेरे अल्फाज़

मेरी बिटिया है चिड़िया

विकास कुमार

2 कविताएं

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नन्ही सी थी वो गुड़िया मेरी जान से प्यारी थी वो सुकन्या मेरी
कैसे कटे अब दुनिया मेरी जान से ज्यादा थी चिड़िया मेरी।

निकली थी वो घर के आंगन से बनने कल्पना किरन बेदी
पैदा होते ही दुनिया में वो गड़ने लगी थी मेरी चाँद सी बेटी

बड़ी हुई तो यौवन को ताकने लगी ऐ अक्ल से दुनिया छोटी
कैसे कैसे पिंजड़े में हम उसको जकड़े थे चिड़िया की भाति

डरते थे कही कोई जानवर खत्म न करदे मेरी नन्ही सी बेटी
कैसे कटे अब दुनिया मेरी जान से ज्यादा थी चिड़िया मेरी।

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