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मेरे अल्फाज़

मेरा हिंदुस्तान

Manoj Madhur

23 कविताएं

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ये हवा कैसी चली, कैसा जमाना हो गया।
जो निशाना साधता था,खुद निशाना हो गया।।

रक्त-माँस,दिल-धड़कन,सीरत,हर इन्सां की एक-सी,
तिलक लगा कर हिन्दू,टोपी पहन मुसलमां हो गया।

दूल्हे बिकते,नेता बिकते,बिकते यहाँ खिलाड़ी भी,
आज का ये आदमी,गोया कि सामाँ हो गया।

भारत में बसते, बिहार,बंगाल,मराठी,गुजराती,
क्षेत्रवाद की चन्द दुकानों में,हिन्दोस्ताँ खो गया।।

@ मनोज मधुर,रूपबास,भरतपुर,राज०




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