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बचपन के वो दिन

                
                                                                                 
                            बचपन के वो दिन,अब जाने कहाँ खो गए।
                                                                                                

सोच रहे हैं क्यों हम, इतने बड़े हो गए।।

बच्चे थे तो सच्चे थे,भले अकल के कच्चे थे,
वजह नहीं हँसने की कोई,कभी बेवजह रो गए।

घर,स्कूल और पार्क,तालाब,यही बस दिनचर्या,
सुबह जगे तो बस्ता खोला, शाम को थककर सो गए।

बरफ चूसना,चूरन खाना,खूब झगड़ना और लड़ाना,
दर्द ठहाकों में मिट जाता,शिकवे आँसू धो गए।

भेद नहीं आँखों ने जाना,कौन पराया कौन है अपना,
नफरत की ये फसल कहाँ थी,कौन बीज ये बो गए।

प्यार ही मिलता प्यार बाँटते,प्यार की भाषा सिर्फ जानते,
प्यार से जिसने गले लगाया,बस उसके ही हो गए।

ना धर्म न पूजा-पाठ, थे फिर भी कैसे ठाट,
क्षण में चोर-सिपाही बनते,पल में राजा हो गए।

 मनोज मधुर,रूपबास,भरतपुर (राज०)


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3 years ago

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