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मेरे अल्फाज़

उलाहना

Manoj Gupta

5 कविताएं

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हमारे पुरखों की चमड़ियों को
नोचवाया जा रहा था।
उन धड़धड़ाती मशीनों के
बड़े-बड़े पंजों से,
लोहे के फड़फड़ाते हुए डैने
परदादाओं की अंतड़ियों को
हवा में उछालते हुए
उलाहना दे रहे थे कि,
यह तुम्हारे पिछड़े रह जाने
गोया
विकास की सुनामी से
बचे रह जाने की कीमत है।
लोहा, कोयला, मैग्नीशियम
की, फसलें कमाने की खातिर!
जमीन को जमीन से उखाड़ा जा रहा था।

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