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मेरे अल्फाज़

बरसात

Manisha Joshi

30 कविताएं

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सुनो बरसात की बुंदें यहीं यह अहकाम लेती हैं
मोहब्बत बाँटने का ये नहीं पर दाम लेती हैं
बुलाती हैं हमें आंगन में गिरती है फुहारें जब
फिसलने से तेरी बाहें हमें पर थाम लेती हैं
निगाहें हैं समंदर सिी भरा है आब इतना क्यों
यूं लगता है निगाहों से मेरी ये जाम लेती हैं
बहारे ही बहारे हैं जहां देखों है हरियाली
बरस कर बारिशे धरती से ईनाम लेती हैं
यही बारिश के मौसम में दुपट्टा सर से सरकें जब
मेरे गेसु से महकी सी वो खुशबू शाम लेती हैं
किसे लगता है दिलकश सबसे ज्यादा बरसता
पानी तो बुंदे मुस्कुरा कर के मेरा ही नाम लेती हैं।

मनीषा जोशी मनी स्वरचित है।

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