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मेरे अल्फाज़

दोराहा

Manisha Jain

27 कविताएं

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कशमकश तो
दो राहों में से
किसी एक को चुनने की थी
पर अब तो
एक नयी ही उलझन है
अतीत छूटता जा रहा है,
भविष्य भी
धुंधलाता जा रहा है|

ज़िन्दगी की इस पगडण्डी पर
हमेशा ही चलने से
कतराती थी ,
दोराहे मिलने की फ़िक्र नहीं थी
पर
मंज़िलों से दूर हो जाने का
डर हमेशा ही था

राही के कदमों के
भटकने से,
मंज़िलों का दूर होना
तो सुना था
पर मंज़िलें ही
राही से मुंह मोड़ लें
यह कुछ नया ही देखा था

समझ नहीं पा रही हूँ
कि क्या करूँ ?
अब कदम लौट चले हैं
शायद
एक ऐसी राह की तलाश में
जहां फिर कोई
दोराहा न मिले
सिर्फ एक राह हो
सिर्फ एक राह |


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