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मेरे अल्फाज़

साक्षात्कार

Mandeep Singh

2 कविताएं

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जानने में लगा है इंसान, इंसान को यहां, अफसोस ! अभी तक जान पाया स्वयं को कहां?
क्यों देखता है दूसरों को दर्पण में, अरे ! पहले स्वयं को देख दर्पण में।

क्यों अंधेरा कर रहा है दूसरों के जीवन में, स्वयं को देख कितना अंधेरा है तेरे जीवन में
दूसरों के सुख से तू इतना परेशान क्यों? यह बता तुझको स्वयं के प्रति इतना झूठा गुमान क्यों?

जरा सोच तू स्वयं के दुख से इतना नहीं दुखी, ईर्ष्या वश लोगों के सुख देखकर होता है जितना दुखी
क्यों जानने में लगा है सारा संसार तू, मेरी मान हृदय पर जमीं धूल हटा स्वयं को निहार तू।

देखता तत्पश्चात जीवन बदले हुए नजारे, परन्तु इससे पूर्व तू अपने अन्तस में झांक प्यारे
माना बहुत क्षमता और योग्यता है तेरे अन्दर, क्यों समझ बैठा है तू स्वयं को दुर्बल, सिकंदर।

अकूत सम्पदा और धन कमाया तो क्या कमाया तूने? हे मानव ! यदि तूने जगत में यश न कमाया तो कुछ न कमाया तूने
तू जरा विचार कर, चेत जा, स्वयं से साक्षात्कार कर, जो भी हैं गुण दोष तेरे अन्दर, तू उन्हें स्वीकार कर, सत्य का मार्ग चुन अवगुणों का तिरस्कार कर।

सदगुरू के वचन अब केवल तू शिरोधार्य कर, हे राही! स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार कर।

 -  हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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