आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   एकता

मेरे अल्फाज़

एकता

Mamta Pandit

2 कविताएं

15 Views
सैयाद ने ये कब सोचा था
कबूतर जाल ले उड़ जाएंगे
दाना देकर तोड़ा जिनको
वो पीड़ा में यूं जुड़ जाएंगे

तुम एक दूजे का हाथ यूं ही
थामे रहना ओ साथी
की सभी रास्ते खुदबखुद
मंज़िल की और मुड़ जाएंगे।

- ममता पंडित

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!