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मेरे अल्फाज़

सावन

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15 कविताएं

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हे 'सावन' किस नशे में तुम हो,
एक पल गरजना अगले में गुमसुम हो,
वरुण को बनाया अपना ताबेदार,
एक पल गुम तो अगले क्षण बयार,
धरा पर चतुर नार ने हरी चद्दर बिछाई है,
नभमण्डल में नादान ने स्याही छितराई है,
मरु धरा के धोरों की कोरी बालू में पसरे हो,
हरियाणा की हरियाली में दिखा रहे नखरे हो,
हिमालय को शिखर तुमसे मिल लहरा रहे,
पठार और मैदान खूबसूरती पे इतरा रहे,
नभ से बदली रिमझिम नीर बरसाती है,
साजन से दूर सजनी का ह्रदय जलाती है,
बागों में गा रही कोकिला राग मधुर है,
दिल प्रियतमा का बालम मिलन को आतुर है,
पूरे दौर-ऐ-आलम में छाई हुई बहार है,
अन्त में तुम्हारे भाई-बहन का प्यार है,
खुशियों का चहुँओर ले आते हुजूम हो,
न जाने 'सावन' किस नशे में तुम हो|
मैन पाल माचरा


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