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मेरे अल्फाज़

जो भी हो ईश्वर हममें घुसा है

Mahesh Rautela

283 कविताएं

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नदी में जब आयी थी बाढ़
बहुत कुछ बहा ले गयी थी,
कुछ फसल, कुछ खेत, कुछ घर
बहुत लोग तैरते -तैरते डूब गये थे।

नानी कहती थी सौ साल पहले ऐसा ही हुआ था,
तब जनसंख्या कम थी, कम लोग बहे थे
अब सरकारें जनसंख्या पर चुप हैं,
कीट -पतंगों की तरह सबको
देखना चाहती हैं।

पहाड़ में पलायन है,
भारत भी कहाँ टिका है?
जो पुल बहा, वह अभी-अभी बना था,
जो बाँध टूटा, उसका जनम ही नहीं हुआ था।

जो भी हो ईश्वर हममें घुसा है,
जितने दोषी हम हैं
उतना दोषी वह भी है,
आखिर हमारा सम्बंध ही ऐसा है,
वह जग जायेगा, तो हम भी जग जायेंगे।

महेश रौतेला

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