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It's your own Accessment.

मेरे अल्फाज़

अपनी अपनी समझ

Mahender Singh

202 कविताएं

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जीने का ढंग क्या बदला,
लोगों ने साम्प्रदायिक कह दिया,
खाता हूं पीता हूं नित्यकर्म करता हूं
इसमें भी जाति वर्ण धर्म दिखता है तुम्हें
खामोश हूं वाचाल नहीं,
कम से कम अब तो बक्श दो ।।

मुल्क की सोचने वाले बल्क में नहीं सोचा करते,
जो बल्क में सोचते हैं वे राजनीति किया करते हैं,
धार्मिक लोग सम्प्रदाय नहीं देखा करते,
जाति और वर्ण की बात तो सोचना दूर
ये लोग तो अमीरी और गरीबी के बीच में खाई नहीं खोदा करते।

- डॉ. महेंद्र

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