फिर ख़ुदा होता मैं, मैं 'मैं' न होता।

                
                                                             
                            असल हाल ए ज़िंदगी छुपाया न होता
                                                                     
                            
ख़ुदा आज हमारा मुख़ालिफ़ न होता।

दवाम-ए-दर्द ने रोक दी दवा की ज़ुस्तज़ु
बगैर ग़म अब बसर नहीं होता।

मंजिल है की बस मुस्तक़िल रहू आज
और कुछ होती गर हाल यह ना होता।

अब ना जीने की चाहत है ना मरने का इंतज़ार
मैं काफ़िर होता गर कश-ए-दर्द न होता।

बेशक पैदा होती दिल में हसरत-ए-आलम
अगर ग़म से 'बिलगे' को इश्क़ ना होता।

सदाकत-ए-ज़िंदगी पता नहीं किसी को
फिर ख़ुदा होता मैं, मैं 'मैं' ना होता।

- मधुकर बिलगे



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1 year ago

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