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मेरे अल्फाज़

कब्रिस्तान

Madhu Chhabra

22 कविताएं

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कल रात
गहन अंधियारी आधी रात
एक पल अचानक आंख खुली
कुछ नमी तकिए के पास से
मुझे हिला हिला कर जगाती थी
मेरे हर्फ
अश्कों की कतारों संग
मेरे सिरहाने बैठे
ख्वाबों और ख्वाहिशों का
हवाला दे कर मुझे जगा रहे थे
मेरी कलम
रह रह कर सिसकियां भर
मुझसे कह रही थी
मेरे कोरे पन्ने
मेरे सुप्त अहसासों को
चीख चीख कर पुकार रहे थे
मेरी खामोशी
मेरे दिल के बांध को तोड़ देने को आकुल थी
अचानक मेज पर पड़े
कोरे पन्ने, भीगी नम आंखों से
स्याही लेकर
जज्बातों की एक कविता
तेजी से बहने लगी
न रोक पाई फिर मैं
खुद ही
अपनी कलम
अपने हर्फ
कोरे पन्ने
और अहसासों में डूब
उस कविता के संग
मैं भी बहने लगी ।

- महक

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