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मेरे अल्फाज़

"क्या सहीं था। क्या गलत था।"

Lovely Nihaliya

8 कविताएं

31 Views
“क्या सही था।
क्या गलत था।
था मैं अनजान।
देखा था न समझा था।
किया था ऐसा काम।
सही गलत की नहीं थी पहचान।
दुनियां के इस भवर में था मैं नादान।
ऊँगली पकड़ के चलना जिसने था सिखाया।
सभ्य समाज का पाठ जिसने था पढ़ाया ।
आज उसको ही मैंने धक्के देकर घर से था भगाया।
पापी पेट का घड़ा कभी नहीं था भर पाया।
लालच की भूख ने पाप मुझसे जो था कराया।
गुनाह हुआ था मुझसे जो ठीक ना कर सका ।
हो गई थी समय की देर जो कभी ना भर सका।
दर दर भटक रही थी मेरी माँ।
मैं चैन की नींद सो रहा।
किसी के कहने पर अय्याशियों के बीज था मैं बो रहा।
करके बुरा काम मैं पल पल खुशियों को था जी रहा।
भुला दिए वो गमों के दिन।
जब माँ नहीं रह पाती थी मेरे बिन।
एक वो दिन था और एक आज का दिन।
भूल गया था मैं वो वक्त वो रातें।
वो माँ की गोद और उसकी वो प्यारी सी बातें।
कैसे मेरे सिर को सहलाती।
प्यारी प्यारी परियों की लोहरिया मुझे थी सुनाती।
माँ के सुन्दर मुख की हँसी तब थी उड़ जाती।
जैसी हल्की सी छींक मुझे आ जाती।
चिन्ता की सिकन ना चेहरे पर लाने देती।
पास नहीं है पैसे यह किसी को बताने देती।
भूख प्यास को भूल कर मेरी सेवा में जुट जाती थी।
खुद भुखे पेट ही सो जाती।
वो मुझे पेट भरके ही सुलाती थी।
आज भूखे पेट पर लात मैंने किस तरह है मारी।
मेरा भरा हुआ है पेट कैसे बढाई मैने अपनी माँ की लाचारी।
मेरी माँ फिर रही है दर बदर मैं आराम फरमा रहा।
कितना नीच बन गया हूँ जो उस भगवान से भी ना घबरा रहा।
वो वक्त भी भूल गया पैसों के मोह में।
बेटे होने का मैं वो फ़र्ज भी भूल गया।
किसी के कहने पर मैने अपनी माँ से ही रिश्ता तोड़ दिया।
उस गुमनाम रास्ते पर क्यों और किस लिए मैंने अपनी माँ को छोड़ दिया।
रिश्तों का गला क्यों इसतरह घोंट दिया।
नादान था माँ... उस बात से अनजान था।
उसके प्यार के मोह में बना मैं शैतान था।
सबकुछ बेक दिया बीच राह में उसने मेरी तरह मेरा भी सीना चीर दिया।
जिसके लिए घिनौना पाप किया था वो भी मुझे छोड़ गयी।
माँ मेरी माँ मैं भटक गया था...।
मेरी खुशी के ख़ातिर मुझे अकेला किसके लिए तू छोड़ गयी।
अब वो भी धोखा देकर मुँह मोड़ गयी।
माँ मै कहाँ खड़ा हूँ तू जल्दी आकर देख मैं किस हालात में दर दर भटक रहा हूँ
कहाँ है तू माँ...कहाँ है तू...
बोला था तूने जब भी मुसीबत आये एक आवाज़ ही बस देना मुझे।
पुकार रहा हूँ मैं माँ... पुकार रहा हूँ मैं।
तेरे साथ बिताए पलों को याद कर अन्तिम साँस ले रहा हूँ मैं।
माँ बस तुझे ही याद कर रहा हूँ मैं।
देख माँ आँखे बंद कर रहा हूँ मैं...तू जल्दी आ माँ
बीच राह में अकेला ही तड़प रहा हूँ मैं।
मेरा बेटा...मेरा बच्चा...बूँद गिरी थी आँखों पर।
बेहोशी की नींद से जागा जब मैं...माँ का हाथ रखा था मेरे माथे पर।
होश में आया देख माँ फुट फुट कर रो पड़ी।
मेरी वज़ह से तेरे ऊपर कैसी आपत्ति आन पड़ी।
सारी मुसीबत की जड़ मैं ही तो हूँ...मैं ही तो हूँ।
ना साथी तेरा ऐसा चुनती... ना तेरी जिंदगी काँटो में बुनती।
माँ ने सारा कुसूर अपने पर ले लिया।
मना करता रहा मैं...माँ ने मेरे सिर का पाप अपने माथे मढ लिया।
माफ़ी मांग रहा हूँ मैं माँ...माफी मांग रहा हूँ मैं।
ना मोह रखूँगा ना माया।
तेरा साथ रहेगा जैसे मेरी छाया।
भूल गया था मैं...
क्या सही था। क्या गलत था।
था मैं अनजान।
देखा था न समझा था किया था ऐसा काम।”
लवली निहालिया
धन्यवाद!
जय हिंद! जय माँ भारत!



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