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मेरे अल्फाज़

मनचले मेघा

Lokesh Kumar

2 कविताएं

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तेरा यूं इठलाकर चलना
मटक कर निकलना
तेरे आशिकों को बड़ा
अखरने लगा,
कब से निहार रहे तेरा रास्ता
तू हैं कि आता ही नहीं,
आता भी हैं तो इस क़दर
आशिक जी भर कर
देख पाता ही नहीं।
आख़िर,
कब तलक होगी
ये आंखमिचौली का "खेल" ..?
ये बेरहमीपन,
तेरा ये अल्हड़ दीवानापन
ये मस्तानी अदा
आख़िरकार,
कब होगा तुझसे मिलन
क्या ये सब बनकर ही
रह जायेगा एक ख़्वाब..?
या फ़िर होगा ,
प्रेम-मिलन साकार।
ऐ मेरे उपवन के मालिन
बस तू आजा ,
तेरे बिन तरस रहे हैं
तेरे चाहने वाले
अब देर ना कर
बरस इस क़दर,
तृप्त हो आशिक
जलमग्न हो धरा.....

## मनचले मेघा

(उपाध्याय)
लोकेश कुमार उपाध्याय
अलवर राजस्थान


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