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मेरे अल्फाज़

प्यारी यादों को

lokesh Dadhich

1 कविता

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प्यारी यादों को
रिश्तो का खेल भी क्या अजीब बनाया है ।
किसी को हंसाया है तो किसी को रुलाया है ।
वह ढूंढता हूं मैं रिश्तो की उन प्यारी यादों को ।
दादी से सुनी उन परियों की कहानी को ।
दादा जी से सीखें उन संस्कारों को ।
वह ढूंढता हूं मैं रिश्तो की उन प्यारी यादों को ।
मां के आंचल में सोया रहता था ।
सपनों की दुनिया में कहीं खोया रहता था ।
पापा के साथ उन बढ़ते कदमों को ।
हंसते मुस्कुराते उन यादों के पन्नों को ।
अक्सर याद करता हूं उन प्यारे रिश्तो को ।
भाई बहन की उन शरारत को ।
रूठ कर बैठना दूर कहीं कोने में ।
और एक दूसरे को मनाने में ।
वह ढूंढता हूं मैं रिश्तो क्यों नहीं प्यारी यादों को ।
दोस्तों के साथ बीती उन मस्ती मजाको को ।
दोस्ती के लिए अपने आप से भिड़ जाने को ।
वह ढूंढता हूं मैं रिश्तो की उन प्यारी यादों को ।
न जाने यह रिश्तो की मिठास क्यों कम हो गई ।
अपनों से अपनों की दूरी इतनी क्यों हो गई ।
भूल कर सारी बीती उन बातों को ।
वह ढूंढता हूं मैं रिश्तो की उनकी यारी यादों को ।

कवि । चंद्र प्रकाश दाधीच


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