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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल: जी नहीं कुछ नहीं है ख़्वाबों में

L.J. Bhagia

16 कविताएं

8 Views
जी नहीं कुछ नहीं है ख़्वाबों में
ये लिखा है सभी किताबों में

रंग और रूप रूह का महके
ज़िन्दगी गुज़रे गर सवाबों में

हमको हासिल नहीं हुआ कुछ भी
उम्र गुज़री है इन्किलाबों में

लूटते हैं सभी को जो हरदम
छुप के बैठे हैं वो नक़ाबों में

रात भर जागता रहा लेकिन
कौन आये मेरे अज़ाबों में

ज़ीस्त जब जब सवाल बनती है
मौत मिलती रही जवाबों में

मैंने हर दिल में झाँक कर देखा
दर्द है शक़्ल के नक़ाबों में

कहने सुनने को है बहुत लेकिन
होंट 'ख़ामोश' है हिजाबों में


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