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मेरे अल्फाज़

ये कामकाजी महिलाएं

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ये कामकाजी औरतें
जी नहीं पाती अपने हिस्से का प्यार...

अलार्म लगाकर उठने वाली ये औरतें
महसूस नही कर पाती सुबह की अंगड़ाइयां

मिनट टू मिनट की सुबह में
अक्सर ही रखती है बच्चों का अधूरा टिफिन

खुद के ऑटो या बस पकड़ने के चक्कर में
देख नही पाती बच्चों की स्कूल जाने वाली बाय

घर से ऑफिस तक की भागम भाग में
खो बैठती है गुलाबी मॉर्निंग वॉक.......

इनकी हथेलियों पर मेहँदी की लाली नहीं
बल्कि पेन की नीली स्याही लगती है

पूरा सावनी दिन दबा आती है
फाइलों के गट्ठर के तले....

आफिस के वर्किंग आवर के कारण
रोक लेती है अपने आँचल में ही नन्हे मुन्नों की भूख

ये एक कैजुअल को बचाने के लिए
छोड़ आती है घर की देहरी पर कितने रिश्ते

इनके तमाम सुख खो जाते है
चन्द कागज़ के टुकड़ों को कमाने में

सारे प्यार से वंचित होते हुए भी
मुस्कुराती रहती है ये कामकाजी औरतें ......

सच में जी नहीं पाती है
अपने हिस्से का अधिकाँश प्यार .....(वत्सु)

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