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मेरे अल्फाज़

शायद कुछ निशां छोड़ जाऊंगा

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एक दिन
मेरा अंतिम दिन होगा,
वो दिन
सब कुछ समेटकर
चल पड़ने का दिन होगा,
समेटूंगा अपने पाप पुण्य ऐसे,
घर छोड़ने पर
जरूरी समान समेटता हो कोई जैसे,
दोस्तों और चाहने वालों को
उपहार स्वरूप
कुछ आंसू दे जाऊंगा
तो कुछ ऐसे भी होंगे
जिन्हें जाने अनजाने
दर्द दे जाऊंगा,
ज़ख्म दे जाऊंगा,
सोचता हूं जब ...
कि पीछे क्या छोड़ जाऊंगा?
शब्दों की जमीं पर
कुछ कविताएं बो जाऊंगा,
शायद कुछ निशां छोड़ जाऊंगा।

-  हरेंद्र सिंह लोधी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 
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