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मेरे अल्फाज़

कितने धर्म

संजीव रामपाल

321 कविताएं

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इतने धर्म चलायमान,
सबके शुभ अशुभ लाभ।
धर्म के लिये अकेला ,
मनुष्य पथ चलता है,
इकट्ठा भीड़ नहीं धर्म पर,
गुमराह धर्म भीड़ में होता है।
बंदी असहाय और हाय,
सब धर्म की जननी है,
धर्म की आड़ में अधर्म होता है।

- बाबा

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