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मेरे अल्फाज़

कर्मपथ

Kusum Sharma

9 कविताएं

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आज फिर मैं कर्म पथ पर बढ़ रही हूंँ
पगधर जीवन डगर पर चल रही हूँ
गर्भ में जीव कोई पल रहा है
सांँस सपनों में मेरे वह भर रहा है
सिर पर धरी टोकरी क्यों हँस रही है
नव नीड़ का निर्माण तुम संग कर रही है
कर्मपथ की डगर चलकर
अन्न संचित कर रही हूँ
खाली टोकरी में स्वप्न
कल के भर रही हूँ
ग़रीबी अभिशाप है
सदियों से ऐसा सुन रही हूँ 
तुम न देखो इसको कभी
बस प्रयत्न ऐसा कर रही हूँ
कर्मपथ पर चल रही हूँ

- कुसुम शर्मा "उमंग"

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