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मेरे अल्फाज़

ख़ुदगर्ज़

Kusum Lata

8 कविताएं

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मेरी आज की कविता का शीर्षक है ख़ुदगर्ज़
ख़ुदगर्ज़
बहुत खुदगर्ज़ हो गई हूँ, मैं आज कल,
सोचती हूँ सिर्फ़ ,अपने ही बारे में,
पैर लटके हुए हैं ,कब्र में
पावों में पायल ढूंढती हूँ
निमंत्रण पत्र रखा ,है यमराज का
मेरे लिए पैताने(पैरों की तरफ़) मे
फिर भी अपने जन्मदिन के ,केक काटती हूँ,
यह जानते हुए भी कि,
एक कलैंडर हट गया है ,दिवार से।
बहुत ही खुदगर्ज़ हो गयी हूँ मैं
ज़िंदगी की मय (शराब)कब की ख़त्म हो चुकी
प्यालों में झांकती हूँ
शायद कोई कतरा बचा हो शराब का
किनारों को ,चाटती हूँ,
बहूत खुदगर्ज़ हो गई हूँ मैं
लिप्स्टिक बिंदिया, का
ज़माना कबका बीत गया
अब बिंदिया का रंग ढूँढ़ती हूँ
होली के दिन
शायद कोई होली का टीका लगा जाए ,
कई दिन लगा देती हूँ ,मिटाने में
बहूत खुदगर्ज़ हो गई हूँ मैं,
गाना सुनने का बहुत शौक़ तो था,
आरती के सिवाय ,कुछ नही गाया,
अब तो चिड़िया की चहचहाट के संग
सुर मिलाती हूँ
या रियाज़ करती हूँ ,गुसलखाने ((बाथरूम)) मे।
बहुत खुदगर्ज़ हो गई हूँ मैं आज कल,
बचपन गए हुए तो
ज़माना बीत गया
दबे पाँव अब भी याद,
आ जाता है गुज़रा वक़्त,
कतरनो से बनी गुड़िया ढूंढती हूँ
संदूक ,पुराने में।
बहूत खुदगर्ज़ हो गई मैं आज कल,
सोचती हूँ अपने ही बारे में
काम न करने के बहाने ढूंढती हूँ
कभी कमर दर्द तो कभी सिर दर्द,
कमी ,निकालती हूँ सिरहाने (तकिया)मे
बहूत खुदगर्ज़ हो गयी हूँ मैं आज कल
कुसुम लता द्वारा




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