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Baar-baar har baar bhatak jaata Hoon.....

मेरे अल्फाज़

बार-बार हर बार भटक जाता हूँ...

Kunwar Sarvendra

81 कविताएं

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ये मोहब्बत भी
कमबख़्त बदनाम हुयी
रोशनी का एक टुकड़ा
उठाने की कोशिश
नाकाम हुयी

तमाम बेकार उम्मीदों का
सहारा लेकर
मैंने सपनों के महल
सजाये थे
किसी की खातिर
बेतरतीब तमन्नाओं के
धुँधले ख़ाके
ख़्वाबों में बसाये थे
किसी की खातिर

न कदमों की आहट
न कोई आवाज़
रास्ते सो गए हों जैसे
चाँदनी रात वीरान हुयी

सोचता हूँ
तेरी यादों के उजालों को
अपने बीते हुए कल के
अँधेरों में दबाकर
ज़माने भर के
दुखों को उगलकर
फिर गुज़रूँ
उन पहचानी गुज़रगाहों से

वही ज़ुल्फ़ें वही नज़रें
वही चेहरे वही जिस्म
चाहूँ तो मुझे
कई और मिल सकते हैं
मुरझाये हुए इस दिल में
और फूल भी
खिल सकते हैं

पर ऐसा कर नहीं पाता हूँ
तेरी यादों के साये में
फिर से लिपट जाता हूँ
मैं तो मुसाफ़िर हूँ
तेरी राह का
बार—बार हर बार
भटक जाता हूँ

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