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मेरे अल्फाज़

आज फिर कोई शख्स वो नज्म दोहराने को है

Kumar Praveen

13 कविताएं

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वर्षों पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ था शायद
आज फिर कोई शख्स आंखों से उतर, दिल में छिप जाने को है।

कुछ यादें धूमिल सी है पर
लगता है वो पल फिर से आने को है,
फिर किसी मसरूफ़ आशिक पर
ये जमाना कहर बरसाने को है ।

यूं तो वो पल आज भी जी रहा हूं मैं
आज फिर कोई शख्स वो नज्म दोहराने को है ।

कल सरेआम बजार में लुटा था मैं
आज फिर कोई चेहरा बेनकाब होने को है।

वफा करके भी तन्हा रोया है हमनें
आज फिर इक वफा, बेवफा कहलाने को है

सर्द रातें भी बिन लिबास ही काटी है हमने
आज फिर कोई शख्स, प्यार आजमाने को है।

कम्बख्त फिर बिकी शराब मुफ्त की, मयखाने में
आज फिर कोई आशिक, अपना आशियाँ जलाने को है।

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