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मेरे अल्फाज़

मेरा गाँव

Kuldeep Kishor

3 कविताएं

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जबसे मेरा गाँव मेरी सुधियों में मुझसे रूठा है
सच मानो मेरे अंतस का शीश महल सा टूटा है
जब से मेरा गाँव ....

सुना है पीपल बूढा होकर मेरी राहे तकता है
मेरी यादों में गलियारा ठंढी आहें भरता है
नही याद है कबसे देखा मैंने अपने छपरे को,
एक अजब सा चित्र ह्रदय में मिटता और उभरता है
बूढ़ी दादी वाला गुस्सा जिसमे प्रेम अनूठा है
जबसे मेरा गाँव ....


वो दुआर की चौपालें वो बैलों वाले गीत कहाँ
स्वार्थ हेतु सब नाते हैं वो सच्चे मन के मीत कहाँ
अब तो लाशों को कान्धा भी देतें हैं मजबूरी में,
साथ उठाते थे छप्पर जो पावन सी रीत कहाँ

हर वासंती उत्सव है पर रंग प्रेम का छूटा है
जबसे मेरा गाँव मेरी ....

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