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मेरे अल्फाज़

पुराने घर की ओर

Kulddep Singh

2 कविताएं

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रोशनी के ज़्यादा पास जाने की चाह में,
पतंगे झुलस जाते हैं मोमबत्ती की आग में।
मत दौड़ उन जगमगाते शहरों की तरफ
अब तो सड़के भी आ गयी है हमारे पहाड़ में।।

क्यों निकला था घर से कुछ है तेरे दिमाग में,
या सब छोडने का वादा करके अया था पहाड़ में।
सूख जाती है डाली अपने पेड़ से बिछड़ने में,
शर्म नहीं आती छोड़ कर पहाड़, पहाड़ी बोलने में।।

जैसे कोरोना चीन में ओर जहरीली हवा बड़े शहर में,
जब इन जैसी कोई मौत आएगी तेरे शहर में।
जब हर दिन जहन्नुम सा लगेगा तुझे तेरे शहर में,
तब सोचेगा कि होता घर तो जाता मै पहाड़ में ।।


रोज नहीं तो ना सही साल में कुछ रोज तो आजा गाँव में,
रोज रो कर पुकारता है ये पहाड़ की एक दिन तो आजा साल में।
दिवाली होली सब फ़ीकी सी हो गयी है अब हमारे पहाड़ में,
चल इस बार जाकर त्यौहार में पुरानी रौनक फ़िर लाते हैं गाँव में।।

कुलदीप सिंह

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