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मेरे अल्फाज़

ख्याल तुम्हारे

Krishna Roy

3 कविताएं

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उलझी रहती हूं तुम्हारे ख़्वाबों में

कुछ कहां करो कुछ सुना करों।
तुम कभी तो मेरे पास आया करों।।

मैं बेवक्त बेवजह उलझी रहती हूं।
तुम्हारे ख़्वाबों में,
कभी हक़ीक़त में आकर भी मुझे से मिल जाया करों।।

यूं जब फुर्सत में बैठे हो तभी न मुझको याद किया करों।
कभी जब उलझे हो अपनी ही उलझनों को सुलझाने में।
तभी भी मुझे याद कर लिया करों।।

माना कि काम बहुत रहते हैं।
तुमको इस जमाने में पर एक जरूरी काम समझ के मुझको भी याद कर लिया करो।।

जानती हूं मशरुफ और मशहूर होने के लिए जमाने में।
इस कदर व्यस्त हो तुम।।

पर इतने खाली तो हम भी नहीं रहते पैमाने में।
अभी वक्त देते हैं।
तुमको तो उसकी कद्र कर लिया करों।।

वरना फिर कहोंगे की तुम बेवफा हो इस जमाने में।

इतना तो आसान भी नहीं है।
हमसे मिल पाना मशरुफ और मशहूर हम भी बहुत है।
इस जमाने में।।

सिर्फ और सिर्फ तुम्हीं को हक़ दिया है ।
हमने इस जमाने में।।

वरना पूछो उनसे जो लोग आज भी खड़े रहते हैं।
हमसे मिलने को लंबी लाइनों में।।

✍️✍️ कृष्णा मंडल ✍️✍️


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