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मेरे अल्फाज़

खरा नहीं कोई शिव

Krishna Kumar Mahato

18 कविताएं

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ये खद्दर वाले बिक रहे हैं
ले अपना मोल
एक एक की बोली लगे
सौ दो करोड़ ।
खरीदने वाला हीं क्यों दोषी
बिकने वाला भी है चोर
जनता के दिये मत का
रखा न जिसने मोल ।
पैसे की जोर जुगत में
सत्ता का किया दुरूपयोग
ताक पर रख राष्ट्र मर्यादा
बिक गये सारे चोर i
क्या पक्ष और क्या बिपक्ष
नही तनिक है भेद
सरेआम बिक रहें आज
भाव हो जिधर अभेद ॥
क्षिक्षा स्वास्थ सड़क सैन्य
सब मद खाली परे हुए हैं
आघात को घाट लगाये
फिर भी ये अरे हुए हैं ।
वेतन लेते भत्ता लेते
संग संत्री सचिव
राहु बनकर सब खरे हैं
खरा नहीं कोई शिव ।
गाँधी के खद्दर का इन्होंने
चिर हरण कर डाला
मुठी भर दुशासन मिल
सबको धृतराष्ट्र बना डाला ।
बिदुर भीष्म कृप द्रोण
सब के सब मौन खरे हैं
स्वराज के चारो स्तम्भ
निस्तेज निसहाय परे हैं ।
ये खद्दर वाले बिक रहे हैं
बिक रही है खुद्दारी
जननी जन्मभूमि की ये
कैसी दुखद करूँ कहानी ॥

 - कृष्ण कुमार महतो

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