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मेरे अल्फाज़

टहलते टहलते

kisalay krishnavanshi

56 कविताएं

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गर जो इल्म होता कि ज़िन्दगी इतना रुलायेगी
यक़ीन मानों इस राह पर हम कभी ना निकलते,

ये अश्क़ जो फ़िसल कर रुखशारों पर ढल गए
इन्हें संभालते तो ख़्वाब आँखों में ना मचलतें,

ये वक़्त बताएगा कि कितनी ख़ुशगवार रही राहें
हम तो यूँ ही निकल गए हैं बस टहलते टहलते,



किसलय कृष्णवंशी"निश्छल 

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