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मेरे अल्फाज़

"मोरी चुनरिया कोरी रहि गयी"

Kiran Mishra

80 कविताएं

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मोरी चुनरिया कोरी रहि गयी !
कासे कहूँ अगिन विरहिन की ,
मन की पीर मन ही में रहि गयी....!
मोरी चुनरिया कोरी रहि गयी..!!

मेंहदी का रंग तपे जेठ दुपहरी
पाँव महावर..बिछुवा भइल बैरी
पायल सिसकि सिसकि सोइ गयी
मोरी चुनरिया कोरी रहि गयी..!!

निष्ठुर पिया संग नेह लगाई ,
पल पल जरी...देह गयी कुम्हिलाई.
रात पूनम की अमावस होई गयी
मोरी चुनरिया कोरी रहि गयी..!!

चाँद चँदनिया पे जाये बलिहारी
पपीहा की पिऊ..बेधे हिय में कटारी ,
वैरन कोयलिया भोरहिन जगि गयी...!!
मोरी चुनरिया ....कोरी रहि गयी..!!

कसके जिया बहे नयना से धारि
सावन बहे कजरा..पे जैसे वारी...
नदिया ताल अँसुअन से भरि गयी !
मोरी चुनरिया ...कोरी रह गयी..!!

किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"
नोयडा
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