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मेरे अल्फाज़

खून के रिश्ते

ऋतु बाला

38 कविताएं

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क्या दिया है इस दौर की जिंदगी ने हमें,
नींद रातों को नहीं, दिन में चैन आए कैसे?
नींद के कर्ज में डूबे हैं सबके सपने,
कैसे फिर देखें और सपने दिखाएं कैसे?
चलते रहते हैं दिन भर मशीन हो जैसे,
कोई मां बच्चों को लोरी भी सुनाए कैसे?
भागते रहते हैं घड़ी की सुइयों की तरह,
कोई ठहरे ही नहीं किसी को बुलाएं कैसे?
कोई पर्दा भी किसी से नहीं करता कोई,
फिर भला पर्दे में किसी को भी छुपाएं कैसे?
घूमा करता है मेरी आंखों में बचपन मेरा,
उन हसीन नजारों को कोई भुलाए कैसे ?
एक थाली में ही खा लेते थे सारे भाई,
बहन के हाथों का स्वाद खाने में लाएं कैसे?
झगड़ा करते थे सभी मां की गोदी के लिए,
पापा के जूते,बड़े पैरों में फसाएं कैसे?
गलतियां करके दुबक जाना बुआ के पीछे,
मौसियों से अपनी फरमाइशें मनवाएं कैसे?
रोते हुए भागते जाना बहुत दूरी तक,
अब नहीं है ताऊ गोद में उठाएं कैसे?
एक बच्चे में सिमट आए हैं सारे रिश्ते,
कोई फिर खून के रिश्तों को निभाएं कैसे?

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