आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Aanch

मेरे अल्फाज़

आंच

Khan Shadab

2 कविताएं

20 Views
आई है यूं हयात में रंज-ओ-अलम की आंच
ख़ुद्दारियों को बेच रही है अदम की आंच

बेचैन-ओ-बेक़रार हूं फिर भी हूं शादमां
मुझ को लगी है जबसे निगाह-ए-सनम की आंच

वो मुस्कुरा रहे हैं उन्हें मुझसे इश्क़ है
मुझको न ख़ाक कर दे कहीं इस भरम की आंच

जो मानते हैं नेज़ा-ओ-तलवार को अज़ीम
चलिए दिखाते हैं उन्हें लौह-ओ-क़लम की आंच

"शादाब" रब्त कर लिया जिसने ख़ुदा के साथ
उसको मिटा सकेगी न ज़ुल्म-ओ-सितम की आंच


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!