आंच

                
                                                             
                            आई है यूं हयात में रंज-ओ-अलम की आंच
                                                                     
                            
ख़ुद्दारियों को बेच रही है अदम की आंच

बेचैन-ओ-बेक़रार हूं फिर भी हूं शादमां
मुझ को लगी है जबसे निगाह-ए-सनम की आंच

वो मुस्कुरा रहे हैं उन्हें मुझसे इश्क़ है
मुझको न ख़ाक कर दे कहीं इस भरम की आंच

जो मानते हैं नेज़ा-ओ-तलवार को अज़ीम
चलिए दिखाते हैं उन्हें लौह-ओ-क़लम की आंच

"शादाब" रब्त कर लिया जिसने ख़ुदा के साथ
उसको मिटा सकेगी न ज़ुल्म-ओ-सितम की आंच


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1 year ago

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