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मेरे अल्फाज़

तुम वापिस लौट तो आओगे न

Kavita Tyagi

36 कविताएं

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प्यारा-सा एक पिंजरा है
सोने का अदृश्य पिंजरा है ,
उसमें पंछी नर-मादा हैं
उनके दो नन्हे बच्चे हैं ,
बच्चों के अम्मा बाबा है
वे पीते हैं और खाते हैं ,
मस्ती में सब चहचहाते हैं
संगीत है इनके जीवन में
सुख नित्य प्रतिपल पाते हैं
पर पिंजरा तो एक पिंजरा है ,
वह अदृश्य हो या सोने का

साजो-सामान सजाने को
सुख का संगीत बजाने को
पिंजरे से बाहर जाना होगा
दाना-पानी लाना होगा
कौन कमाए दाना-पानी ?
नर राजा या मादा रानी ?
उद्घोष हुआ तब नर-मुख से
शास्त्रार्थ किया अधिकृत सुख से
मादा में गुण है ममता का
नर में गुण भारी क्षमता का
माता पिंजरे में रहे ,सन्तति को दुलराए
नर आकाश में उड़े स्वतंत्र और दाना-पानी लाए
मादा ने कहना मान लिया
आजादी का सुख त्याग दिया
मादा की दुनिया सिमट गयी
जीवन आँसुओं में पिघल गया
नर ने दाना देकर उसका
सब सुख आहों में बदल दिया
मादा पिंजरे से झाँकती है
दिन याद पुराने आते है
नभ में वह उड़ना चाहती है
जब पंछी उड़कर जाते हैं
कहीं भूल तो नहीं गयी उड़ना
सोचके पंख फड़फड़ाती है
उसकी क्षमताएँ कम नहीं हैं
सिद्ध करने को छटपटाती है
पर पिंजरा तो एक पिंजरा है ,
वह अदृश्य हो या सोने का

मादा ने पिंजरा खोल लिया ,
नर से संकेत में बोल दिया
मैं भी बाहर उड़ जाती हूँ ,
दाना-पानी ले आती हूँ
नर ने फिर उसको समझाया ,
बाहर तेरा जाना ठीक नहीं है
दुनिया है बहुत क्रूर है प्रिये ,
कहीं दया-धर्म और प्रीत नहीं है
मादा ने उत्तर दिया, कहा ,
घुँट-घुँटकर जीना ठीक नहीं है
पिंजरा तो एक पिंजरा है ,
वह अदृश्य हो या सोने का

फिर नर ने पाश नया फेंका,
हर बार मना मैं करता हूँ
नर पंछी कोई तेरा मन न मोह ले ,
यही सोचके डरता हूँ
मन में उठता है प्रश्न एक
तुम वापिस लौट तो आओगी न?
जैसी जाओगी , वैसी ही
क्योंकि पिंजरा तो एक पिंजरा है
वह अदृश्य हो या सोने का

होंठों को रखना बंद बाहर ,
तेरे होठों की मुस्कान नशीली हाला है
ढँककर रखना बालों को ,
काले-घुँघराले बाल व्याध की जाला है
फँस जाए न भोला नर कोई
यही सोचके हर पल डरता हूँ
मन में उठता है प्रश्न यही
तुम वापिस लौट तो आओगी न?
जैसी जाओगी , वैसी ही
क्योंकि पिंजरा तो एक पिंजरा है
वह अदृश्य हो या सोने का

शहद पगी तेरी मीठी वाणी ,
अमृत घोलती कानों में
उदर-पूर्ति की खातिर
मुट्ठी से बिखरते तेरे दानों में
फँस जाए न कोई भोली मादा
यह सोचके क्या मैं डरती हूँ
तेरी राहों में रहती हैं पलकें
पल-पल प्रतीक्षा करती हूँ
मैंने कभी प्रश्न उठाया क्या ?
तुम वापिस लौट तो आओगे न ?
जैसे जाओगे वैसे ही !
मैं औरत सृजनहारा हूँ
विश्वास पालती हूँ मन में
तुम लौटके वापिस आओगे
जैसे जाओगे वैसे ही !
क्योंकि घर का सुख पिंजरे में है
यह अदृश्य हो या सोने का 


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