आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Nahin ho sakte sveekary

मेरे अल्फाज़

नहीं हो सकते स्वीकार्य

Kavita Tyagi

36 कविताएं

84 Views
जिनके आगे सब नतमस्तक थे
जो सबको थे शिरोधार्य
पितामह और राजगुरु थे
भीष्म और द्रौणाचार्य
उनके कुछ निर्णय थे ऐसे
नहीं हो सकते स्वीकार्य


गुरु की लघुता ने मेधावी को
शिष्यत्व से वंचित किया था
महालघुता ने वह छीन लिया,
जो शिष्य ने संचित किया था
गुरु द्रोण ने अपनी द्क्षिणा में
जब एकलव्य का अंगूठा ले लिया
आत्मा ने अवश्य धिक्कारा होगा,
वाणी भी कुछ काँपी होगी
मान और धन के सुख की चादर
गुरु ने तब झाँपी होगी
जब धर्म था अर्जुन के हेतु
आशीर्वचन को पालना
कथित धर्म में सहा होगा तब,
आत्मा का सालना
अन्तःकरण की सुनते तो
शुभ होते सब कार्य
पर उनके निर्णय थे ऐसे
नहीं हो सकते स्वीकार्य



राजधर्म के पथ पर चलते
ऐसा काम पितामह कर गये
वधू की अस्मिता लुटी देख भी
पुरखे नींव मौन की धर गये
वृद्ध तनु में विमल आत्मा
पितामह जीते-जी ही मर गये
या वैभव में जीने के आदी ,
सुख-साधन छिनने से डर गये
तब हो या विज्ञान का युग अब ,
आत्मा कचोटती जरूर है
सत्ता के सुख से राजधर्म
तब था जैसा , वैसा ही
आज भी मजबूर है
विमल आत्मा ,
त्याग-तपस्या
परदुखकातर शूर है
मानवता का धर्म बड़ा है
पालन इसका है अनिवार्य
पर उनके निर्णय थे ऐसे
नहीं हो सकते स्वीकार्य


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!