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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Kavi Yogendra

1 कविता

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नाव बनकर समन्दर में डूब रहा हूं मैं
अब तुम्हारी भी आँखों मे चूभ रहा हूं मैं

तू मुझे भुला दे इसका कोई ग़म नही
दिल को सूकूं है,तेरा मेहबूब रहा हूं मैं

कहते हैं लोग मै पागल हो गया,तेरे इश्क़ में
मगर तेरी ख़ामोशी से ऊब रहा हूं मैं

मेरी शायरी इत्तेफाक है या कोई फ़साना
सुख़नवरों को फिर भी कबूल रहा हूं मैं

रखता हूँ हुनर पत्थर को ज़िन्दा करने का
दुनिया कहती है आदमी भी खूब रहा हूं मैं

- चिराग़ सलेमपुरी
मो0 8957825461

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