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मेरे अल्फाज़

लहू की खुशबू

Kavi Narendra

3 कविताएं

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पहाड़ो से उड़ती पवन से आ रही थी।
वतन की आबरू बचा रही थी।
पुष्प की सुगंध करवट बदल रही थी ।
वतन की सोंधी मिट्टी मुसकुरा रही थी।

रक्त सरिता बह चली ।
कल-कल करते झरने रो पड़े।
छा गया सन्नाटा।
था खून का प्यासा।

देश भक्ति की चादर ताने,
भयभीत नहीं देख दुश्मन अंजाने
लड़ रहा था माँ का लाल

आ रही थी लहू की खुशबू
देशभक्ति की लव से प्रज्वलित

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