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मेरे अल्फाज़

ओ झारखण्ड ! ओ झारखण्ड !

Kavi Hari

31 कविताएं

67 Views
उबड़-खाबड़, पथरीला,
कंटीला, झार बेहद प्रचंड
ओ झारखण्ड ! ओ झारखण्ड !

तेरे लाडलों का ठिकाना जंगल था
जंगल का जीवन बड़ा अमंगल था
थक गये थे वो तो जीवन से हारकर
तूने रस्ते पर लाया उन्हें सँवारकर
दबे हुए स्वरों को तूने कर दिया बुलंद
ओ झारखण्ड ! ओ झारखण्ड !

सदियों से फूल तेरे बगियों के कुम्हलाया था
अभावों की तपिश में न वो खिल पाया था
उपहास सब झलते-झलते
हिलते-मिलते, खिलते-खिलते
खुल गयी कलियाँ बंद
ओ झारखण्ड ! ओ झारखण्ड !


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