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मेरे अल्फाज़

दुःख अति प्यारा लगने लगा

Kavi Hari

31 कविताएं

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सुख रोज़ ही मुझको ठगने लगा
मुझे दुःख अति प्यारा लगने लगा।

दुःख तो साथी है पल पल का
और सुख साथी पल दो पल का
अब दुःख मुझको बहलाने लगा
और दर्द मुझे सहलाने लगा
दुःख आँख का तारा लगने लगा
मुझे दुःख अति प्यारा लगने लगा।

दुःख ने मुझको एक शील दिया
शील ने एक सुंदर दिल दिया
इस दिल के अंदर प्यार पले
इस प्यार से ही संसार चले
दुःख पालनहारा लगने लगा
मुझे दुःख अति प्यारा लगने लगा।

दुःख के हैं पाश बड़े उलझे
इन पाशों में ही हम सुलझे
जीवन का खेल है बहुरंगी
दुःख में हर रंगों को समझे
दुःख रंगमय गारा लगने लगा
मुझे दुःख अति प्यारा लगने लगा।

मैं मोक्ष नहीं पाना चाहूँ
दुःख नगरी में आना चाहूँ
दुःख की मस्ती तुम क्या जानो
दुःख से न उबर पाना चाहूँ
दुःख मधुरस धारा लगने लगा
मुझे दुःख अति प्यारा लगने लगा।

सुख रोज़ ही मुझको ठगने लगा
मुझे दुःख अति प्यारा लगने लगा।

-कवि हरि शंकर, पटना।


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