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मेरे अल्फाज़

दिलरुबा तू मिरी जिंदगी बन गई

Kavi Hari

31 कविताएं

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दिलरुबा तू मिरी जिंदगी बन गई
रात की कालिमा रौशनी बन गई।

पुष्परस प्यास में, प्रीत की आस में
भृंग की आह भी रागिनी बन गई।

चाँद भी खिल उठा, रात भी हँस पड़े
ये हँसी ये ख़ुशी चाँदनी बन गई।

आदमी से भले जानवर हो गये
सर्पिणी आजकल आदमी बन गई।

-कवि हरि शंकर, पटना।


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