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मेरे अल्फाज़

कटु-सत्य

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कटु-सत्य

सच्चाई का भान जिसे वो सच ही तो कह जाएगा।
पर पोंगा पंडित तुम देखो पन्ने रंगता रह जाएगा।

कलम लिए जो हाथ खड़ा तलवारों से कब डरता है,
धमनी में जो लहू पड़ा बन कर स्याही बह जाएगा।

है बीच समर में द्वंद्व नहीं शत्रु इंगित और अंकित है,
दिखा जिसे जो सत्य यहां बन कृष्ण वही कह जाएगा।

अंगद तो विरले होते हैं जो छद्म भेष ये धरे नहीं।
पांव ज़मीं पर पड़े नहीं अभिमानी भी ढह जाएगा।

शब्दों की धारा लिए चला जो भाव समाहित सबका है,
झंकृत कर दे जो मन मन्दिर वो शब्द तभी लह जाएगा।

गिर गिर के जो सम्भला है, वो पथिक हुआ पथद्रष्टा ही,
खा ठोकर जो सम्भल गया बन राह वही गह जाएगा।

तन में कोई फ़र्क नहीं, अंतर्मन जिसका चेतन है,
हंस रहा बगुलों में जो कोई धृत वही मह जाएगा।

बड़ी कठिन ये तपोभूमि अग्नि आहूत जो सत्य रहा,
जो हाथ जलाए बैठा है होकर पावन सह जाएगा।

 रजनीश "स्वच्छंद"


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