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मेरे अल्फाज़

चोर- चोर

kartik srivastava

142 कविताएं

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चोर- चोर से कह रहा, चोरों के जज्बात।
चोरी करना है हमें, यह धंधे की बात।।

टके-टके की बात है, चौरासी का जोड़।
सोलह फिर भी कम रहे, होती पीछे होड़।।

हेरा फेरी की नहीं, नहीं किया गठ जोड़।
सांची-सांची कह रहा , होता भंडा फोड़।।

अक्षर - अक्षर जोड़ते, शब्दों का व्यापार।
ढाई आखर जोड़कर, बनते है सरदार।।

मेरे भी कुछ ख्वाब हैं, उनमें बनें उसूल।
दिन में खोजी मै रहा, रात बिताई मूल।।

अनुपम कुमार श्रीवास्तव
कानपुर

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