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मेरे अल्फाज़

दिल मगर अपनी तरह टूटता है |

kapildev gupta

8 कविताएं

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एकाएक यूँ दरख़्त कोई टूटता है 
दिल मगर अपनी तरह टूटता है 

उसको टूटना था, तो टूट गया 
फर्क क्या, चोट या मरहम से टूटता है 

जो खड़ा रहता था आँधियों में भी 
वो नर्म हवा से ह़ी टूटता है 

खुद्गुमाँ है ए खिलौना कितना 
टूटना इसे भी है देखिये कब टूटता है 

बहुत चोटें खाता है कोई अपनों से 
तब कहीं जाकर जड़ से टूटता है 

लाखों ज़ख्म जब्त किये फिरता है
यूँ ह़ी नहीं आँखों का मंज़र टूटता है 

कपिल देव गुप्ता सुलतानपुर





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