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You and me

मेरे अल्फाज़

हमारी पाठक कांची सिंघल कहती हैं, तुम और मैं एक ना हो सके...

kanchi singhal

13 कविताएं

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ओ मन ओ मन मेरे
हाँ यकीनन एक हो जाना चाहते थे हम दोनों
तुम भी ; मैं भी,
पर ये हो न सका

हाँ यकीनन बेहिसाब मजबूर थे हम दोनों
तुम भी; मैं भी;
बस तकते रहे यूँ ही दूर से एक दूसरे को

हाँ यकीनन चंद तितलियाँ ख्वाब की
पलको पे रखे रहे हम दोनों
तुम भी; मैं भी ;
और बस यूँ ही बेसबब
एक सफ़र के मुसाफ़िर हो गये हम दोनों 

- कांची सिंघल 

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