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Jeete jee pyar do ...

मेरे अल्फाज़

जीते जी प्यार दो

Kanchan Pathak

1 कविता

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वक्त की करवटों पर पिघल जाएंगे
कल चमकते सितारे भी ढल जाएंगे
ये जो अट्टालिकाएं हैं तनकर खड़ी
खण्डहर में इमारत बदल जाएंगे ।
आज कोई गया, कल कोई जाएगा
काल का चक्र है सबको आज़माएगा
तब ये पूजन ये तर्पण पितरपक्ष से
ताप मरुथल का क्या सिक्त हो पाएगा
बुझ गया जो अतृप्ति में जलकर दीया
वह अंधेरा क्या फ़िर दिप्त हो पाएगा ।

जल चढाकर हो भक्ति किसे दे रहे
पिण्ड तर्पण की मुक्ति किसे दे रहे
चैन जीते जी सिरहाने पर न रखा
कर्म काण्डों की युक्ति किसे दे रहे
पार चौखट धुले आसमां को गया
तिल के दानों से क्या शान्ति मिल जाएगी
आस की लाश जीवन में ढोता रहा
उस मलिन मुख को क्या कान्ति मिल जाएगी
जीते जी प्यार दो थोड़ा सम्मान दो
ना कि वृद्धाश्रम का घुप बियावान दो
चैन मिल जाएगा शांति मिल जाएगी ।
जल चढाकर मरी शाख पर होगा क्या
प्यास प्राणों का क्या तृप्त हो पाएगा ?

- कंचन पाठक

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