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मेरे अल्फाज़

दिल समझ न पाया

kanchan dobhal

40 कविताएं

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ऐसा लगा कुछ जब तुमसे नजरें टकराईं ..
मुस्कुराकर बरस गए हों जैसे हारसिंगार कई..
डरी मैं सोचकर,
अपने ख़्वाबों में सिमटकर..
हकीकत से दूर जाकर,
फिर थोड़ा ठहरकर..
तुम्हें खो दिया तो.. ये दिल रो दिया तो..
ख्याल आया रह रहकर..
तुम्हें पाया ही कब है..
भला नभ धरा में समाया ही कब है..

आँखों का भोलापन इठलाया मेरा..
होंठों से अपनापन शरमाया मेरा..
कशिश बैठ गई ठिठककर..
आंसू तैरते रहे सिसककर..
हकीकत के आशियाँ को बर्बाद करते हो..
स्वप्नमहल में राज करते हो..
जान बूझकर सताते हो..
या अन्जान बन इतराते हो तुम..
दिल समझ न पाया..❤

कंचन_उनियाल_डोभाल

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