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मेरे अल्फाज़

बचपन

kanak lakhesar

11 कविताएं

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स्कूल का वो दिन था
बारिश का मौसम आया था
खिड़की से देखता मेरा मन
जब खूब डग मगाया था
हिन्दी की टीचर आईं थीं
शुरू किया फिर पढाना
बाहर जाने के में सोचूँ बहाने
क्योकि बारिश में था मुझे नहाना
पानी का मै बहाना लेकर
बाहर तो चलीं जाती थी
पर मन ना भरता उतनी देर में
क्योकि बारिश में भीग नहीं पाती थी
अब घर जाने के नये बहाने
ओर नये विचार लगातीं थी
फिर पेट दर्द का बहाना लेकर
में घर को चलीं जाती थी
ये है मेरी और बारिश की कहानी
जो आज भी याद आती हैं
बारिश की ये बूँदें मुझे
फिर एक बार बचपन मुझे दे जाती हैं

- कनक लखेसर
पुत्री-श्री भंवरलाल लखेसर

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