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मेरे अल्फाज़

गरीबों की एक बस्ती में लोकतंत्र

Kailash Sanolia

21 कविताएं

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गरीबों की एक बस्ती में लोकतंत्र

उस बस्ती में पसरा था घनघोर अंधेरा
घर आंगन के वृक्षों की टहनियों पर
परिंदों का लगा था मेला,
इन परिंदों की सांसों को सता रहा था
समीप के उद्योगों-
की चिमनियों
से उगल रहा धुंआ।
झोपडिय़ों में टिमटिमा
रही थी रोशनी
आंगन में बिछी थी खटियां,
कहीं मेहनतकशों के आराम का नजारा
तो कहींं लालटेन की
रोशनी में पढ़ रही थी बेटियां।
चौराहें पर एक दूजे का थामे हाथ
बच्चें खेल में थे मशगूल,
इन नौनिहालों की मस्ती से
कच्चा धरातल उगल रहा था धूल।




अकस्मात उस बस्ती में
चुनाव प्रचार के
काफिलों का मचा शोरगुल।
बेशकीमती वाहनों की रोशनी से
जगमगा उठी झोपडिय़ां,
लक्जरी गाडिय़ों की रोशनी से
चमकने लगे गंदगी के ढेर।
रोशन हो उठे दीवारों
पर लिखे स्लोगन
स्वच्छता में बसता भगवान।
मेरा भारत देश महान।
बस्ती के बीच थम गया
वाहनों का काफिला
अनूठी थी वहां की तस्वीर,
खादी- कुर्ता के परिधानों में
वाहनों से उतरे
लोकतंत्र के कर्मवीर।
एक झोपड़ी में इन राजनेताओं ने
दी दस्तक।
उस आशियाने में
उगल रहा था चुल्हा निरंतर धुुंआ,
उसमे धीमी-धीमी सुलग रही थी आग।
तवा सेक रहा था रोटियां
जिस पर था एक नारी का हाथ।
एक बच्चा तपन से कराहता,
मां की गोद में
 दूजा बैठा लगाए टकटकी
उसे रोटी की थी आस,
उस अबोध के नसीब में फटे चीथड़े
झांक रहा था शरीर
पिता बैठा था सोच में आज
ना मिली मजदूरी
पीछा ना छोड़ रही तंगहाली।

प्रचार के काफिले ने इस झोपड़ी
में किया प्रवेश,
एक ने जोडक़र हाथ उस
महिला से किया प्रणाम।
दूजा बोला, आपकी सेवा
के हम अभिलाषी,
आप अपना वोट देकर रखे हमारा ख्याल।
यह काफिला जब गया निकल
रोटी के इंतजार में बैठा वह मासूम
अपनी मां से पूछ बैठा जिज्ञासा भरा सवाल,
मां ये कौन है क्या करते काम,
क्यों आए ये क्यों बोल रहे
थे रखना हमारा ख्याल।


पसीने से लथपथ शरीर को
आंचल से पोछती वह बोली-
लोग इन्हें कहते हैं प्रजातंत्र के रखवाले,

हम गरीबों के छीनते ये निवाले।
आलीशन बंगलों मेंं इनका निवास,
वोट के नाम गरीबों की बस्तियों में
जमीर बेचकर
पांच वर्ष लेते
प्रजातंत्र का स्वाद।
झोपडिय़ों में एक दिन हाथ जोडक़र
प्रजातंत्र के मंदिर में रोज- रोज
गरीबों का उड़ाते
उपहास ।

कैलाश सनोलिया
राज्य स्तरीय अधिमान्य पत्रकार मप्र शासन
नागदा जंक्शन जिला उज्जैन मप्र



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