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मेरे अल्फाज़

वो कटहल के पौधे...

Jyotsana Khatri

20 कविताएं

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रसोई की खिड़की पर रखे
मिट्टी के पात्र में...
जम आये हैं कुछ कटहल के पौधे...
जो रख दिये थे मैंने संभालकर...
जीवन संघर्ष की परिभाषा को गढ़ते...
रोज एक नया बदलाव ये लाते...
बढ़ रहे हैं बिना अपने भविष्य को जाने...
कल कहाँ होंगे क्या पता...
पर नियति सब जानती है...

संघर्ष कर आगे बढ़ना ही होगा,
बिना भविष्य फल की चिंता किये,
ये सिखाते हैं कि कैसे एक
विशालकाय वृक्ष भी आखिर
जन्म लेता है एक सूक्ष्म बीज से...
धरा का प्रेममयी स्पर्श पा,
प्रकृति के थपेड़ों से जूझता...
जीवन संघर्षों में तपकर बनता है विशाल...

रोज देखती हूँ इसको
बढ़ रहा है ये अपने गंतव्य की ओर...
सच हों तुम्हारे सपने और पाओ तुम
एक स्थाई जगह...
जहाँ फैला सको तुम
अपनी शाखाओं को...
ढूंढ रही हूँ एक ऐसी ही जगह
तुम्हें एक स्थायित्व देने को...!!!

ज्योत्सना

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