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मेरे अल्फाज़

युद्धं देहि

Jiwan Sameer

66 कविताएं

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उपल वर्षा न सर को कर सकी अवनत
करो तुम और भी आघात, सह लूंगा।
अंधेरा और भी घन कर गई उल्का
दिशाएं पी गया सहसा तिमिर गह्वर
कि मेरे हाथ श्रंखल में,नहीं विस्मय
चलाई विजलियां तुमने न कब मुझ पर
अंधेरों और आंधी से मुझे घेरो
नया तो यह नहीं उत्पात सह लूंगा।
तुम्हारे हाथ बेचूंगा न मन मुक्ता
न वास्ती पर तुम्हारा मानता शासन
करो पीडन न पाओगे समर्पित यह
किसी का हो चुका कबका ह्रदय आसन
कि मुझसे छीन लो स्वरग्राम लेकिन मैं
मरण के पूर्व मन की बात कह लूंगा।
कि जीवित हूं अजित हूँ और भी सुन लो
युयुक्त है अभी उत्तप्त औ उद्धत
कि मेरे साथ है जन समुदाय है प्रेमल
तिलक बन जायेगा प्रत्येक रक्तक्षत
डराओ मत अनल-चंचल शिराओं को
चिता के पूर्व भी दिन रात दह लूंगा।

जीवन समीर

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